
जीवन परिचय
लक्ष्मीनारायण शर्मा जो की एक 13 साल का बच्चा था यह अकबरपुर के ब्रज छेत्र मे रहता था जो की अपनी माता से बहुत प्रेम करता था कुछ समय बाद उसकी माता की मृत्यु हो जाती है ओर वह बहुत दुखी रहता है ओर उसे विश्वास रहता है की केवल भगवान ही उसे उसकी माता से मिला सकते है। उन्होंने सन्यास का मार्ग अपनाने के सिवाय हनुमान जी के माध्यम से श्री राम जी की प्राप्ति का लक्ष्य बनाया।
वह घर को छोड़कर गुजरात चले जाते है जहा एक संत से उनकी मुलाकात होती है वह इनकी परीक्षा लेते है। लक्ष्मण शांत , सरल व विनम्र रहते है वह किसी भी प्रकार से अपनी प्रसंसा सुनने पर मोन रहते व जब उनको लगता की इस जगह से मेरा मोह बड़ रहा है तो वह उस जगह को छोड़ देते।
जब उन्होंने इस आश्रम को छोडा तो वह कभी पेड़ के नीचे , तो कभी नदी मे तपस्या करते व नदी के किनारे सो जाते वह नदी मे इतनी देर तक तपस्या करते थे की आसपास के लोगों को लगता की वह डूब गए है। वह भिक्षा मांगकर अपना जीवन चलाते थे। वह पशु पक्षी से बात करते थे उनके लिए भोजन का प्रबंध करते थे उन्होंने आध्यात्म के माध्यम से प्रकृति को समझने का प्रयास किया।
रेलगाड़ी मे क्या हुआ था
लगभग 25 वर्ष की आयु मे लक्ष्मीनारायण ब्रिटेन जाने वाली एक ट्रेन के फर्स्ट कोच मे बैठ गए जहा पर एक अंग्रेज अधिकारी द्वारा उनसे टिकट मांगा गया जब टिकट मांगने पर बाबा ने मना किया तो अंग्रेज अधिकारी के द्वारा उनको बाहर निकाला गया परंतु उसके बाद एक चमत्कार देखने को मिला जिसकी ब्रिटीशर्स ने उम्मीद नहीं की होगी जैसे ही बाबा रेलगाड़ी से उतरे तो रेलगाड़ी को जब पुनः स्टार्ट किया तो रैलगड़ी आगे नहीं बड़ी जबकि जाच करने पर कोई भी तकनीकी खराबी नहीं पाई गई।
जब रेलगाड़ी आगे नहीं बड़ी तो रेल्वे कर्मचारियों के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला जाता है की कही एसा तो नहीं की यह सब उन बाबा की वजह से हो रहा है तब सभी अंग्रेज अधिकारी व अन्य यात्री बाबा को मनाने गए जब बाबा पुन रेलगाड़ी मे बैठे तो गाड़ी पुन चल पड़ी ओर बाद मे बाबा के द्वारा 4 टिकट भी दिखाई गई जो की रहस्यमयी था इस घटना के बाद लक्ष्मीनारायण की आध्यात्मिक यात्रा शुरू हुई ओर आगे चलकर वह नीम करौली बाबा के नाम से जाने गए।